शनि चालीसा हिंदी लिरिक्स

शनि चालीसा लिरिक्स

शनि चालीसा हिंदी लिरिक्स
शनि चालीसा हिंदी लिरिक्स

Song: Shani Chalisa
Singer: Jitender Singh
Lyrics: Traditional
Music composer: Jitender Singh
Copyright: Isha Music

शनि चालीसा लिरिक्स

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुःख दूर करि  कीजै नाथ निहाल ॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु  सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय राखहु जन की लाज ॥
॥ चौपाई ॥
जयति-जयति शनिदेव दयाला। 
करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
चारि भुजा तन श्याम विराजै। 
माथे रतन मुकुट छवि छाजै ॥

परम विशाल मनोहर भाला। 
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै। 
हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। 
पल विच करे अरिहिं संहारा ॥
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन । 
यम कोणस्थ रौद्र दुःख भंजन ॥

सौरि मन्द शनी दश नामा। 
भानु पुत्रा पूजहिं सब कामा ॥
जापर प्रभु प्रसन्न होई जाहीं। 
रकहु राव करें क्षण माहीं ॥

पर्वतहूं तृण होई निहारत। 
तृणहूं को पर्वत करि डारत ॥
राज मिलत बन रामहि दीन्हा। 
केकैई की मति हरि लीन्हा ॥

बनहूं में मृग कपट दिखाई। 
मात जानकी गई चुराई ॥
लषणहिं शक्ति बिकल करि डारा। 
मचि गयो दल में हाहाकारा ॥

दियो कीट करि कंचन लंका। 
बजि बजरंग वीर को डंका ॥
नृप विक्रम पर जब पगु धारा। 
चित्रा मयूर निगलि गै हारा ॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी। 
हाथ पैर डरवायो तोरी ॥
भारी दशा निकृष्ट दिखाओ। 
तेलिहुं घर कोल्हू चलवायौ ॥

विनय राग दीपक महं कीन्हो। 
भूंजी मीन कूद गई पानी ॥
श्री शकंरहि गहो जब जाई। 
पारवती को सती कराई ॥

तनि बिलोकत ही करि रीसा। 
नभ उड़ि गयो गौरि सुत सीसा ॥
पाण्डव पर ह्नै दशा तुम्हारी। 
बची द्रोपदी होति उघारी ॥

कौरव की भी गति मति मारी। 
युद्ध महाभारत करि डारी ॥
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला। 
लेकर कूदि परयो पाताला ॥

शेष देव लखि विनती लाई। 
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना। 
गज दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। 
मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। 
चोरी आदि होय डर भारी ॥
तैसहिं चारि चरण यह नामा। 
स्वर्ण लोह चांदी अरु ताम्बा ॥

लोह चरण पर जब प्रभु आवैं। 
धन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥
समता ताम्र रजत शुभकारी। 
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी ॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै। 
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। 
करे शत्रू के नशि बल ढीला ॥

जो पंडित सुयोग्य बुलावे। 
विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई ॥
पीपल जल शनि-दिवस चढ़ावत। 
दीप दान दै बहु सुख पावत ॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। 
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥

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